रुका हुआ भुगतान और यह जानने का कोई रास्ता न होना कि क्यों - यह ग़रीबी जैसी समस्या नहीं है। पर यह जल्दी ही वैसी ही समस्या बन जाती है।
दो साल तक पेंशन नहीं आई। वह ज़िला दफ़्तरों से दूर रहती थी, आवागमन के साधन सीमित थे, और किसी ने उसे नहीं बताया था कि इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है। जिस रुकावट को कोई क्लर्क एक दोपहर में सुलझा सकता था, वह स्थायी बन चुकी थी।
उसने यह बात आजीविका अधिकार संगठन की एक बैठक में उठाई। एक सामुदायिक समन्वयक ने उसे राज्य की शिकायत-प्रणाली समझाई और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन के ज़रिए शिकायत दर्ज कराते वक़्त उसके साथ बैठा।
एक हफ़्ते के भीतर एक अधिकारी ने उससे संपर्क किया और पहचान व बैंक विवरण माँगे ताकि लंबित मामले को आगे बढ़ाया जा सके।
अब तक जो हासिल हुआ है वह यह है कि यह समस्या उसके घर से निकलकर एक ऐसी व्यवस्था में पहुँच गई है जिसे इसे दर्ज करना, सौंपना और जवाब देना ही होगा। यह खाते में पैसा आने के बराबर नहीं है, और आगे की निगरानी विभाग की ज़िम्मेदारी है।
यह भरोसा उसका अपना है, किसी का दिया हुआ उपहार नहीं। उसने मसला नाम देकर पहचाना और शिकायत दर्ज कराने का फ़ैसला ख़ुद लिया। सामूहिक संगठन ने एक जटिल व्यवस्था को इतना समझने-योग्य बना दिया कि उसमें प्रवेश किया जा सके।
जिस रुकावट को कोई क्लर्क एक दोपहर में ठीक कर सकता था, वह स्थायी बन चुकी थी।
शिकायत के रास्ते तभी काम करते हैं जब आपको पता हो कि कौन-सा रास्ता सही है
हर राज्य एक हेल्पलाइन चलाता है। कमी इस बात में है कि किसी के पास हेल्पलाइन होना, और यह जानना कि कौन-सा रास्ता उसकी समस्या के लिए सही है, शिकायत-संख्या को सँभाल कर रखना, और जब कोई आश्वासन पूरा न हो तो आगे बढ़ते रहना - इनके बीच फ़र्क़ होता है। समन्वयक यही अंतर पाटते हैं।