जिस स्कूल में कुछ भी नहीं है, उसमें भी एक फ़र्श, चार दीवारें, एक खिड़की और एक गलियारा तो होता ही है।
SPICE की शुरुआत एक ऐसे विचार से हुई जो तब तक मामूली लगता है जब तक आप उसे काम करते नहीं देखते: जिस इमारत में बच्चा बैठता है, वह ख़ुद कुछ शिक्षण कर सकती है। फ़र्श पर ग्रिड बना दें तो वह भिन्न पढ़ाता है। खिड़की के फ्रेम पर निशान लगा दें तो वह अक्षर बनाना सिखाता है। गलियारे को नाप लें तो वह दूरी और अनुमान सिखाता है।
यह सजावट नहीं है और यह निवेश का विकल्प भी नहीं है। दीवार पर संख्या-रेखा रंग देने भर से अपने आप कुछ नहीं बदलता। शिक्षक को उसके सहारे पढ़ाने का आत्मविश्वास होना चाहिए, बच्चों को उसका इस्तेमाल करने लायक़ अक्सर कमरे में होना चाहिए, और परिवारों के पास कोई जगह होनी चाहिए जहाँ वे इसे उठा सकें जब वे न हों।
इसलिए यह तरीक़ा एक साथ बंडल होकर आया: जगह में बदलाव, साथ ही शिक्षक प्रशिक्षण, साथ ही एक पुस्तकालय, साथ ही नामांकन अभियान, साथ ही अभिभावक-शिक्षक बैठकें, साथ ही वह सामुदायिक स्वामित्व जिसे शिक्षा के अधिकार का ढाँचा मानकर चलता है पर शायद ही कभी हासिल कर पाता है।
बारह शिक्षकों ने बताया कि जो वे पढ़ा रहे थे उसे दिखाना उनके लिए आसान हो गया। अभियानों के ज़रिए 238 बच्चे नामांकित हुए। भाग लेने वाले शिक्षार्थियों में बने रहने की दर 89 प्रतिशत पर टिकी रही, जिसे रंग-रोगन ने नहीं बल्कि घर-भ्रमण और माता-पिता के साथ बैठकों ने बनाए रखा।
इस कहानी को बताने का कारण है उन चीज़ों को अलग-अलग करने से इनकार करना जिन्हें आमतौर पर अलग रखा जाता है। बुनियादी ढाँचा, शिक्षण पद्धति और उपस्थिति सामान्यतः तीन अलग परियोजनाएँ होती हैं, तीन अलग बजट के साथ। यहाँ इन्हें एक ही समस्या माना गया, जो कि वे असल में हैं।
दीवार पर संख्या-रेखा रंग देने भर से अपने आप कुछ नहीं बदलता।
सबसे सस्ता क्लासरूम अपग्रेड
रंग, प्रशिक्षण और एक पुस्तकालय, ऐसे स्कूल में जो पहले से ही मौजूद है। यह किसी सरकारी कक्षा को पढ़ाई के लायक़ बनाने का सबसे कम-लागत तरीक़ा है।