वर्षों तक परिवार दूसरों के खेतों पर मज़दूरी करके गुज़ारा करता रहा। जिसकी कमी थी वह सिर्फ़ आमदनी नहीं थी।
देवंती का परिवार दूसरों की ज़मीन पर काम करता था। पैसा एक बाधा थी। दूसरी बाधा जानकारी की थी - कौन-सी योजनाएँ मौजूद थीं, गाँव की बैठक कब होनी थी, कौन क्या तय करता था।
वह एक आजीविका अधिकार संगठन से जुड़ी और मासिक बैठकों व प्रशिक्षण में जाने लगी। उसने रसोई-बाग़ीचा शुरू किया। सब्ज़ियाँ घर के क़रीब आ गईं और कुछ बाज़ार-ख़रीद बंद हो गई।
फिर सवाल पूछने की वही आदत बाहर की ओर मुड़ गई। निवासियों ने कहा कि ज़रूरी ग्राम सभा बैठकें नियमित रूप से नहीं हो रही थीं। देवंती और अन्य सदस्य इसे गाँव से ब्लॉक तक, और ब्लॉक से ज़िले तक ले गए। इसके बाद गाँव में विकास कार्य शुरू हुआ।
सामूहिक संगठन ने कुछ और भी उठाया जिसे निवासी वर्षों से झेल रहे थे: वन विभाग के कर्मचारियों द्वारा बार-बार अनाज इकट्ठा करना। सदस्यों ने इसे अपने ब्लॉक-स्तरीय संगठन के ज़रिए उठाया और प्रभागीय वन अधिकारी के पास गए। यह प्रथा बंद हो गई।
एक रसोई-बाग़ीचा और वन विभाग के ख़िलाफ़ एक दावा - दोनों एक ही कहानी के हिस्से हैं। एक ने घर के भोजन को नक़दी पर कम निर्भर बनाया। दूसरे ने यह स्थापित किया कि जंगल की सीमा पर रहने वाले लोग पूरी बस्ती को प्रभावित करने वाली किसी प्रथा पर सवाल उठा सकते हैं।
एक ने घर को नक़दी पर कम निर्भर बनाया। दूसरे ने बस्ती को नज़रअंदाज़ करना कठिन बना दिया।
पहले सामूहिक संगठन, फिर बाक़ी सब कुछ
DEHAT ने सामूहिक संगठन जुटाया, सीख आयोजित की और संस्थागत परिचय कराए। देवंती ने मुद्दे चुने और उन्हें आगे बढ़ाया। समूह का गठन वह हिस्सा है जिसे धन की ज़रूरत है; बाक़ी सब इसी से निकलता है।